'I'... for 'i'diosyncracies... for pouring those 'i'deas i have in store.. out!!! for 'i'mages 'i' create in my m'i'nd... for the expession'i'st in me... 'I'ism... for you!!!!
आया बन के खुशबू.. दर्द बन गया,,,
झुकी पलकों के आंसू, उसे दिखे भी नहीं...
दबी हंसी में समेटे बीते हुए मौसम...
सोचते हैं आगे दास्ताँ लिखें कि नहीं...
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